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एक जख्मी संविधान के साथ जीने के लिए मजबूर हैं हम

 कृष्ण देव सिंह, बुधवार मल्टीमीडिया न्यूज नेटवर्क


रायपुर ।  विश्व का सबसे बड़ा गणतंत्र का दम भरने वाले भारत में कब और कहाँ कितना पालन हो रहा है हमारे संविधान का ? आज संविधान दिवस के मौके पर इस सवाल के साथ ऐतिहासिक तस्वीरें हमें कुछ याद भी दिला रही है कि हमारे मनीषियों ने  दो वर्ष ,11 माह और 18 दिनों की कड़ी मेहनत से हमारा संविधान तैयार किया था । बाबा साहब डॉ. भीमराव अम्बेडकर के नेतृत्व में संविधान प्रारूप समिति के सदस्यों ने इसका मसविदा बनाया था । डॉ. अम्बेडकर ने  संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेन्द्र प्रसाद  को 26 नवम्बर 1949 को संविधान का प्रारूप सौंपा,जो देश मे 26 जनवरी 1950 से लागू हुआ । डॉ. राजेन्द्र प्रसाद देश के प्रथम राष्ट्रपति बने ।

आज भी  यह सवाल  बारम्बार हमारे सामने खड़ा हो रहा है कि जिस आशा और विश्वास के साथ प्रारूप समिति के सदस्यों ने 'अध्ययन, चिन्तन और विचार -विमर्श के बाद राष्ट्र की दिशा और दशा तय करने वाले इस महाग्रन्थ की रचना की, क्या उन पर हम खरे साबित हो पा रहे हैं ? बहरहाल ,  सभी को संविधान दिवस की हार्दिक बधाई के साथ -साथ मेरा आपसे  एक प्रश्न है कि  क्या हम सभी एक जख्मी संविधान के साथ जीने के लिए मजबूर नहीं हैं?
     

हमारे देश में 365  दिन में से एक दिन  संविधान पर चर्चा के लिए भी निर्धारित है । आज देश के पास संविधान तो है लेकिन संविधान के पास वो देश नहीं है जो संविधान के मुताबिक आचरण करता हो । राजनीतिक और संवैधानिक पदो पर बैठे हुए लोगो के लिए संविधान एक खिलौना और न्यायपालिका व कार्यपालिका के लिए बिछोना है। जनता के लिए संविधान सिर्फ एक आभासी छाता है क्योंकि संविधान के तहत जैसा जीवन और देश हमें बनाना था, हम बना ही नहीं पाए ।

 मैंने भी भारतीय संविधान को उतना नहीं पढ़ा है जितना की एक छात्र को पढ़ाया जाता है । चूंकि मैं अभियांत्रिकी का छात्र रहा हूँ इसलिए संविधान को अन्य छात्रों के मुकाबले कुछ कम ही पढ़ा है । लेकिन संविधान के साथ जब--जब खिलवाड़ होती है,तब-तब मुझे आम लोगों की तरह ही वेदना होती है ।

हमारा संविधान एक कम सत्तर साल का हो गया है । यानि उसकी वरिष्ठता और परिक्वता को लेकर अब कोई सवाल खड़े नहीं किये जाना चाहिए । हम सब एक ऐसे संविधान के सहारे व्यवस्था को संचालित कर रहे हैं जिसमें समानता का आभास बाहर है? हमारे संविधान निर्माताओ ने एक ऐसी लचीली इमारत बनाई जिसे हम वक्त और जरूरत के मुताबिक तोड़-मरोड़ सकते  हैं । हमने इस सुविधा का पूरा-पूरा लाभ भी उठाया और पिछले ६९ साल में संविधान को कम से कम 124  बार तो संशोधित किया ही है, इसके बावजूद हम अपने नागरिकों को बराबरी पर नहीं ला सके। संविधान सबकी मदद करना चाहता है लेकिन कुछ लोग हैं जो उसे ऐसा नहीं करने देते । वे समर्थ ,समझदार और महान  लोग हैं । 

संविधान की व्याख्या करने वाले लोग,उसे वक्त जरूरत के हिसाब से बदलने वाले लोग तो संविधान को वेदों की तरह पावन नहीं मानते । अगर मानते तो देश में संविधान की शपथ लेने वाले लोग तमाशे न करते, तमाशा करने से डरते। अगर डरता तो इस देश में मौजूदा महाराष्ट्र जैसा प्रहसन न होता । सत्ता के प्रयोगों की जगह सत्य के प्रयोग हो रहे होते । सत्ता पाने के लिए हजारों करोड़ के भ्रष्टाचार को क्लीन-चिट न दे दी जाती । जनता द्वारा चुने विधायकों को भेड़ -बकरियों की तरह होटलों में न रखना पड़ता ।           

हमारे पास एक संविधान है, हम सब उसका गुणगान करते हैं और नीचे से लेकर ऊपर तक सम्विधान का इस्तेमाल केवल शपथ लेने के लिए करते हैं । मुझे भी लगता है कि यदि हमारे पास संविधान न होता तो हम झूठ बोलने के लिए शपथ किसकी खाते। हमें और हमारी नयी पीढ़ी को निर्धारित करना पड़ेगा की वो संविधान का इस्तेमाल कैसे करना चाहती है ?क्या उसे केवल ऐसा संविधान चाहिए जो केवल शपथ विधि के समय काम आता है या एक ऐसा संविधान चाहिए जो आम आदमी को सुरक्षा,और बराबरी के लिए संरक्षण प्रदान करता है ।
           

भारतीय संविधान की प्रस्तावना एक ऋचा जैसी है उसमें कहा गया है की  -'हम भारत के लोग, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न, समाजवादी , पंथनिरपेक्ष,लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त करने के लिए तथा उन सबमें व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखण्डता सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढ़ाने के लिए दृढ संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवम्बर 1949 ई0 (मिति मार्ग शीर्ष शुक्ल सप्तमी, सम्वत् दो हजार छह विक्रमी) को एतद द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।'


संविधान की इस ऋचा को भारत की आम जनता ने तो शायद आत्मसात कर भी लिया हो लेकिन भारत के भाग्य विधातागण इस ऋचा को आत्मसात करने के लिए अभी तक तैयार नहीं हैं ,वे प्रतिदिन व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता,अखण्डता को नुक्सान पहुंचते हैं और वो भी राष्ट्रवाद के नाम पर ।'हम भारत के लोग' ही अपने संविधान की रक्षा नहीं कर पा रहे हैं,हमारे संविधान पर 'हमारे भारत के ही लोग' प्रहार कर रहे हैं। क्या आज का दिन ऐसे संविधान  विरोधी तत्वों को पहचानकर उन्हें अलग-थलग करने का नही है ?क्या ये काम 'हम भारत के लोग' ही नहीं कर सकते हैं,जबकि हमारे आस मताधिकार है ?

 हमें तय करना पड़ेगा कि हम  असल के सेवकों को चुनें जो न बिकें और न अपनी निष्ठाएं बात-बात पर बदलें । हम ऐसे लोगों को सरकार बनाने के लिए चुनें जो अपने लिए नहीं,कुर्सी के लिए नहीं बल्कि 'हम भारत के लोगों'के लिए काम करने का जज्बा रखते हों । जो त्रिशंकु विधानसभाओं और सांसदों के होते हुए भी बिना लड़े एक न्यूनतम साझा कार्यक्रम बनाकर देश को तरक्की के रास्ते पर आगे ला सके | आज राजनीति उदारता से रिक्त होती जा रही है । राजनीति को अधिनायकवाद से बचाने के लिए संविधान के अनुरूप चलने की जरूरत है । तभी संविधान दिवस मनाने की सार्थकता  प्रमाणित होगी अन्यथा नहीं ।

 भारतीय राजनीति में आई नैतिक पतन के लिए राजनीतिक दल व उसके नेता कम जिम्मेदार नहीं है। लोकसभा,विघान सभा,नगर निकायों के चुनावों में टिकट बांटते वक्त पार्टी के निष्ठावान, कर्तव्यनिष्ट और साफ सुधरी छवि वाले नेताओं/ कार्यकर्ताओं की सर्वाघिक उपेक्षा की जाती है और चुन-चुनकर ऐसे लोगों को बड़े पैमाने पर प्रत्याशी बनायें जाते हैं जिनका नैतिकता,सिद्यान्त,आदर्श,सभ्यता,संस्कार जैसे गुणों से दूर-दूर का नाता नहीं रहता ।

इसी का प्रतिफल आज अगर महाराष्ट्र सहित पुरा देश भुगत रहा है । इसका यह मतलब नहीं हैं कि संवैधानिक संस्थानों, न्यायपालिका और कार्यपालिका में बैठे हुए लोग दूध के धुले है । हमाम में ये सभी बराबर के जिम्मेदार हैं। देश को बर्बादी के कगार पर लाने के लिए चाल,चरित्र और चेहरा की राजनीति करने वालों का असली चरित्र नग्न स्प से सामने आ चुका है । ऑपरेशन कमल कराने वालों से कम दोष उस पार्टी और नेताओं का नहीं है जो लालची और भ्रष्ट नेताओं को टिकट देकर विधायक या सांसद बनाते हैं। जाहिर है जो पैसों के लिए दल बदलेंगे तो वे दल में पैसों के लिए ही रहेंगे। क्या खरीदने वालों से वे "कम दोषी है जो अपनी कीमत गले में लटका कर घूम रहे हैं। और उनका भी दोष कम नहीं है जो उनके कार्यगुजारियों को छिपाते हैं, महिमामंडित करते है व उन्हें सर्वजनिक रूप से नग्न करने के बजाय इसे उपलब्धि बताते फिरते है। क्या यह वक्त ठहरकर और गम्भीरता से चिन्तन मनन कर सकारात्मक कदम उठाने का नही है।                  

सियासत का असली चेहरा क्या होता है और मुखौटे के भीतर की शक्ल कितनी घिनौनी होती है, ये महाराष्ट्र में चली राजनीतिक नौटंकी के दौरान रोजाना सीरियल के एपिसोड की तरह देश के सामने आ गया है। हम पत्रकारों के लिए  इस तरह की राजनीति बहुत कम देखने को मिलती है, जिसमें साम-दाम-दंड-भेद सब एक साथ मौजूद हो। हर पल बदलते हालात हों, कौन किस पर कब भारी पड़ जाए, किसी को ख़बर नहीं हो, एक से बढ़कर एक दांव हों और मस्त बयानबाज़ी हो।पहले भतीजे पवार का डायलॉग वायरल था कि शरद पवार के साथ हैं और सरकार बीजेपी-एनसीपी की बनेगी।अब चाचा पवार का डायलॉग वायरल है कि ये गोवा, मणिपुर,कर्नाटक नहीं है, ये महाराष्ट्र है, मुंबई है। 

सुप्रीम कोर्ट से एक-एक दिन सुनवाई टलते जाने से हॉर्स ट्रेडिंग को थोड़ी-थोड़ी मोहलत तो मिलती गई, लेकिन अनुभवी शरद पवार इतनी जल्दी मैदान से बाहर होने के मूड में दिख नहीं रहे और बीजेपी के धनबल और सत्ताबल को पहली बार इतनी कड़ी टक्कर मिलती दिख रही है, अंतिम तस्वीर क्या निकलेगी, इसके लिए कल तक इंतजार करना पड़ रहा है लोगों को। 
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जरा सोचिए कितना मन कचोट रहा होगा,  सात पुश्तें संवारने का सुनहरा मौका होटल के एक्जिट गेट पर ही मौजूद है, लेकिन शिवसैनिकों के डंडों का डर और पवार की मजबूत पकड़ ने बेचारों के दिमाग को होटल के बाहर निकलने पर रोक लगा रखी है। जरा सोचिए बेचारे मुख्यमंत्री के दिल पर क्या गुजर रही होगी, जो शपथ भी ले चुके हैं, नोटों की कोई कमी नहीं है, लेकिन मंजिल सामने होते हुए भी फिलहाल दूर है। वैसे असली मजे तो उस डिप्टी सीएम के हैं, अब सरकार चाहे इधर की बनी या उधर की, सबसे हाई डिमांड में हैं तो डिप्टी सीएम की कुर्सी तय है, शपथ तो एडवांस में ले ही रखी है। ऊपर से बोनस ये कि अभी देश में भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस वाली सरकार का राज है तो रातों-रात हजारों करोड़ के सिंचाई घोटाले के भ्रष्टाचार से क्लीन चिट मिलने की चिट्ठी और खबर वायरल हो गई है।         

महाराष्ट्र की मौजूदा राजनीतिक स्थिति ने उन लोगों को भी लिखने-बोलने-सोचने पर प्रेरित कर दिया है, जो भक्त-चमचों-चाटुकारों की आक्रामकता और बदतमीजियों के भय से सोशल मीडिया से कटे रहते हैं। चुनाव सुधार की ज़रूरत, राज्यपाल के विवेकाधिकार पर पुनर्विचार, एक पार्टी के टिकट से जीतकर दूसरी पार्टी की सरकार बनवाने जैसी परंपरा  देश में बदलने की बजाय आगे क्यों बढ़ाई जा रही है? ये सवाल सोशल मीडिया पर अलग-अलग पोस्टों की शक्ल में दिख रहे हैं। मुख्यमंत्री जैसे संवैधानिक और तारीख तय कर तामझाम के साथ शपथग्रहण की परंपरा को चोर शपथ की तरह दिलवाए जाने का हास्य प्रसंग अब चल गया है। खुलेआम हॉर्स ट्रेडिंग को बढ़ावा दिया जा रहा है, ये पूरा देश देख रहा है क्योंकि इस सवाल का जवाब आम लोग भी जानते हैं कि जब शिवसेना बीजेपी के साथ नहीं है और सारे निर्दलीय साथ आने पर भी बीजेपी के नंबर पूरे नहीं हो रहे हैं तो फ्लोर टेस्ट बिना तोड़-फोड़ पूरा कैसे हो सकता ।

भाजपा के कार्यकर्ता एवं समर्थक केन्दीय गृह मंत्री अमित शाह को चाणक्य कहते हैं । वो कहते हैं कि कुछ भी हो जाये शाह तो जोड़-तोड़, खरीद-फरोख्त या इडी की धमकी देकर सरकार बनवा ही लेंगे । उनके अनुसार ये सभी विधाएँ राजनीति में जायज हैं । ऐसा कहते हुये उन्हें अपनी पार्टी और अमित शाह पर काफी गर्व भी महसूस होता।
       

अब भारत की जनता और समाज को ये सोचने की जरूरत है कि यदि भाजपा का अधिकारिक विचार धारा ऐसी है तो गैरअधिकारिक कैसी होगी? क्या यह पार्टी अपनी सरकार बनाने या बचाये रखने के लिये किसी भी स्तर पर जाने में कोई संकोच करती होगी ? क्या यह भारत जैसे महान लोकतांत्रिक गणराज्य वाले देश का दुर्भाग्य नही है?
 

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